आज हमारे नेता प्राथमिक स्कूलों कि बात पर फूले नहीं समा रहे हैं, इसलिए नहीं कि शिक्षा के क्षेत्र में कोई चमत्कार हो गया है बल्कि इसकिये कि पाठशालाओं के करोड़ों बच्चों को दोपहर का खाना खिलाने की अनोखी योजना को अंजाम दे रहे हैं। बेशक मिडडे मील दुनिया की एक बहुत बड़ी योजना है , हमारे नेता बताते हैं की जब गरीब का बच्चा स्कूल जायेगा तो सबसे पहले ब्लैक बोर्ड पर उस दिन के खाने का मीनू देखने को मिलेगा। यानी विज्ञान, गणित या किसी दूसरे विषय की जानकारी के बजाये ब्लैक बोर्ड खाने की जानकारी दे रहा है।
हमारे रहनुमाओं की सोच में प्राथमिक शिक्षा की यह तस्वीर बेहद लुभावनी लग रही है। ज्यादातर स्कूलों में तैनात एक या दो अध्यापक जब तब पल्स पोलियो, जनगणना चुनाव जैसे तमाम गैर शैक्षिक कामों में लगे रहते हैं और बाकी वक़्त में पाठशाला में नून तेल, आटा, सब्जी में उलझे रहते हैं। खाना बनाने के बेशक कोई न की महिला की ब्यवस्था होती है पर हकीकत में इतना सारा काम एक महिला के बश का नेहीं होता लिहाजा बच्चे इसमें हाथ बटाते हैं। यानी ब्लैक बोर्ड का मीनू पढ़ लेने के बाद मुंह में आ रहे पानी को शांत करने के लिए वे भी बर्तन धोने खाना बनाने में जुट जाते हैं, उधर मास्टर साहब खानसामा की भूमिका निभाते निभाते थक जाते हैं इसलिए पढ़ाने से परहेज़ करते हुए अगले दिन के खान पान का इंतजाम करने में जुट जाते हैं और आखिर में छुट्टी का वक़्त हो जाता है। कुल मिलकर अब इन स्कूलों में पढाई को तरजीह नहीं दी जाती, इसका जीता जागता सुबूत यह है की ज़्यादातर स्कूलों के पांचवीं क्लास के बच्चों को पांच का पहाडा याद नहीं है।
गरीबों के बच्चों को खाना खिलने की इस योजना को दूसरे तरीके से भी लागू किया जा सकता था, अगर इस योजना को स्कूलों में चलने की वजाए बच्चों के माता पिता या अभिभावक को राशन दिया जाता या आर्थिक सहायता के तौर पर स्वता ही एक निश्चित धनराशी उनके खतों में जमा कर दी जाती तो कहीं बेहतर होता, इससे खाने की गुणवत्ता में बरती जाने वाली लापरवाही ख़त्म होती, बच्चों के आलावा उनके परिवार की दशा ही सुधरती और स्कूलों में पढाई का माहौल भी कायम रहता। गरीबों के बच्चों को सिर्फ खाना देकर हमारे रहनुमा उन्हें साक्षर भले बता दें पर हकीकत हमेशा उनके दावे को मुंह चिढाती रहेगी।
mid day meel yojna se khase naraz he aap,lekin sarkari master bahut khush he,lekin upar pat-thhi,voh bhi is ki burai karte heVASTAV ME AAP SE SEHMAT HOON KI PESA STUDENTS KE KHATE ME JAMA KAR DIYA JAYE.LEKIN HAR CONDITION ME BHIRASHTACHAR TO HOGA HI.me to yeh kehta hoon ki EDUCATION DEPARTMENT ka nizi karan kar diya jaye aur ngos ke madhyam se sare kam karvaye jaye to kuchh sudhar ki ummid he.phir bhi gadbad to zaroor hogi.bhirashtachar is desh ki janta ke blood me bus gaya he.us ko koi nahi nikal saktaheACH-CHHE AUR IMANDAR LOG BHI IS DESH ME BAHUT HE par unko unki imandari ki saza zaroor milti he
ReplyDeleteEDUCATION DEPARTMENT ka nizi karan kar diya jaye aur ngos ke madhyam se sare kam karvaye jaye to kuchh sudhar ki ummid he.phir bhi gadbad to zaroor hogi.bhirashtachar is desh ki janta ke blood me bus gaya he.us ko koi nahi nikal saktaheACH-CHHE AUR IMANDAR LOG BHI IS DESH ME BAHUT HE par unko unki imandari ki saza zaroor milti he
ReplyDeletemid day meel yojna se khase naraz he aap,lekin sarkari master bahut khush he,lekin upar pat-thhi,voh bhi is ki burai karte heVASTAV ME AAP SE SEHMAT HOON KI PESA STUDENTS KE KHATE ME JAMA KAR DIYA JAYE.LEKIN HAR CONDITION ME BHIRASHTACHAR TO HOGA HI.me to yeh kehta hoon ki EDUCATION DEPARTMENT ka nizi karan kar diya jaye aur ngos ke madhyam se sare kam karvaye jaye to kuchh sudhar ki ummid he.phir bhi gadbad to zaroor hogi.bhirashtachar is desh ki janta ke blood me bus gaya he.us ko koi nahi nikal saktaheACH-CHHE AUR IMANDAR LOG BHI IS DESH ME BAHUT HE par unko unki imandari ki saza zaroor milti he
ReplyDeleteमेरा भारत महान इस नारे का मतलब अब सरकार का यह बनता है (शिछा का क्या करोगे हाथ में कटोरा थाम) अगर बच्चे शिछा प्राप्त कर लेंगे तो कही नेता न बन जाये और नोकरी तो क्या ही मिलेगी लेकिन मेरा भातर महान
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